KabootarBazi - Pigeon Race on Republic Day of India - Jama Masjid Area of Old Delhi - by Farid Ali

Channel: Capitol India News

129,823

TIP: Right-click and select "Save link as.." to download video

Initializing link download... Initializing link download.....

Historical Pigeon Race in Old Delhi's Jama Masjid Area.
All that is wonderful historical Jama Masjid area, There was noisy sounds of whistles everywhere, Republic Day celebration in New Delhi were observed something similar ... The scrum began to race pigeons on rooftops, and hundreds of different flocks flying for longer lists these Pigeons.
Pigeon racing (kabutar bazi) did not end with the era of Maharajas and Nawabs and in keeping with the times has become a technologically advanced sport.
Of the old veterans there are still a sizable number, mainly in old Delhi, Agra, Lucknow, Hyderabad and other citadels of the Mughal era. For example Allauddin Mian ( name changed to protect identity) a prosperous mithai shop owner in Chandni Chowk is a classic example of the old traditions. "Kabooter bazi was a sport of Nawabs," says Allaudin and adds, "Not many people are doing it the old way anymore."
Before independence, pigeon handling was the pastime of gentlemen. For men like Allaudin, a khalifa- or master - of the pigeon world, it still is. While there are thousands of pigeon handlers in old Delhi, there are only a few dozen khalifas, men who trained under earlier masters and for whom pigeon handling is a serious craft. To them, overt competition is crass. Allaudin has a veritable pigeon empire, with perhaps a dozen coops scattered across the neighborhood. He has breeding coops and coops for sick birds. He has coops full of pigeons from India, Afghanistan, Iran and places he can't even name. He has workers to help care for them.
: हर तरफ सीटियाँ बजती रही और कबूतरबाजों का शोर होता रहा, गणतन्त्र दिवस का जश्न पुरानी दिल्ली में कुछ इसी तरह मनाया गया, ... कबूतरों की रेस देखने के लिए छतों पर भी जमघट लगा है, और अलग अलग सैकड़ों के झुण्ड में ये मसक्कलियाँ भी लम्बी उड़ानें भर रहीं हैं,
:- आमिर, चैम्पियन कबूतरबाजी (26 जनवरी के मौके पर लोग सेलिब्रेट करते हैं, छतों पे कबूतरों रेस होती है जिसका लोग आनन्द लेते हैं,...)
:- कबूतरबाजों के लिए गणतन्त्र दिवस के दिन होने वाली ये रेस किसी जंग से कम नहीं, हर कोई अपने कबूतरों को लम्बी दूरी तक उड़ाने के लिए पूरा जोर लगा रहा है, ... और आख़िरकार कई सालों से कबूतरबाज़ी के खलीफा रहे मौहम्मद अकरम इस बार भी फिर खलीफा बन ही गए, इस मौके पर उनके साथ उनके साथियों की ख़ुशी का भी ठिकाना नहीं है, ...
:- खलीफा मौ. अकरम, कबूतरबाज़ी के विजेता, (.. हमारा कबूतर सदर से भी आगे गया इसलिए हम खलीफा बने हैं, हमें बहुत ज्यादा ख़ुशी है कि हमारा कबूतर आगे गया, .. इन्हें हम बादाम और घी खिलाते हैं, ...)
:- कबूतरबाज़ी का मज़ा सिर्फ कबूतरबाज़ ही नहीं बल्कि सब लोग इसे देखने के लिए छतों पर चढ़ जाते हैं, यहाँ तक कि छोटे छोटे बच्चे भी इसका पूरा लुत्फ़ उठा रहे हैं, ...
बाईट:- अस्बा, दर्शक, (आज छुट्टी का दिन है, लोग छतों पर चढ़े हुए हैं और कबूतरों की इस रेस का मज़ा ले रहे हैं, ...)
:- कबूतरबाज़ी का ये शौक़ भी हर किसी के बस की बात नहीं, कई ऐसे कबूतरबाज़ भी हैं जो अपने इस शौक़ पर सालाना लाखों रूपए तक खर्च कर देते हैं, इन कबूतरों को लम्बी रेस का घोडा बनाने के लिए इन्हें घी और बादाम खिलाए जाते हैं,
Story by - Farid Ali